जीवित जड़ों से तैयार किया उमकार लिविंग रूट ब्रिज, हेली वार को पद्मश्री सम्मान

मेघालय के सिएज गांव में पेड़ की जड़ों से बना प्राकृतिक पुल बना आकर्षण का केंद्र, पर्यटक स्थल के रूप में विकसित हो रहा गांव
शिलांग, मेघालय। मेघालय की पहाड़ियों में प्रकृति और इंसानी हुनर का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। यहां लिविंग रूट ब्रिज (Living Root Bridge) पेड़ों की जीवित जड़ों को विशेष तकनीक से दिशा देकर तैयार किए जाते हैं। ऐसा ही प्रसिद्ध उमकार लिविंग रूट ब्रिज सिएज गांव, शिलांग क्षेत्र में पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
खासी बिरादरी से आने वाले बह हेली वार ने इस पारंपरिक कला को संरक्षित करने और आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बताया जाता है कि उन्होंने महज 10 वर्ष की उम्र में जीवित जड़ों से पुल तैयार करने की इस पारंपरिक प्रक्रिया को सीखना और करना शुरू किया था। आज उनकी उम्र करीब 70 वर्ष है और पांच दशक से अधिक समय से वह इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।

लिविंग रूट ब्रिज बनाने में रबर फिग (Ficus elastica) जैसे पेड़ों की जड़ों को धीरे-धीरे एक दिशा में मोड़ा और आपस में जोड़ा जाता है। समय के साथ जड़ें मजबूत होती जाती हैं और प्राकृतिक रूप से एक मजबूत पुल का आकार ले लेती हैं। इन पुलों का उपयोग गांव के लोग एक स्थान से दूसरे स्थान तक आने-जाने के लिए करते रहे हैं।

पर्यटन गांव के रूप में विकसित हो रहा सिएज
सिएज गांव में करीब 200 लोगों की आबादी बताई गई है। मेघालय सरकार इस क्षेत्र को पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने की दिशा में काम कर रही है। गांव तक पहुंचने के रास्तों और पर्यटक सुविधाओं को बेहतर बनाने पर भी ध्यान दिया जा रहा है, ताकि देश-विदेश से आने वाले पर्यटक यहां की प्राकृतिक सुंदरता और पारंपरिक लिविंग रूट ब्रिज को करीब से देख सकें। बह हेली वार की इस पारंपरिक कला और पर्यावरण संरक्षण के प्रति उनके योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली है। भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 2026 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया है।






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