पारंपरिक पोशाक क्लस्टर में हुनर को मिल रही नई पहचान, गमछा बनाने में कारीगर महिलाओं की कड़ी मेहनत, आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहे कदम

संतोष कुमार श्रीवास्तव
सहारा जीवन न्यूज़बक्सा, असम। असम के बक्सा जिले के मजराबारी गांव में स्थित मानस पारंपरिक पोशाक क्लस्टर में पारंपरिक वस्त्र निर्माण से जुड़ी महिला कारीगरों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में कार्य किया जा रहा है। यहां भारत सरकार के एमएसएमई मंत्रालय की SFURTI (पारंपरिक उद्योगों के पुनर्जनन के लिए निधि योजना) के तहत सामान्य सुविधा केंद्र संचालित किया जा रहा है। यह परियोजना वित्तीय वर्ष 2015-16 में स्वीकृत हुई थी और इसकी कार्यान्वयन एजेंसी आरन्यक है।

केंद्र की संचालिका ने बताया कि असम में सम्मान के प्रतीक के रूप में लोगों को भेंट किया जाने वाला गमछा तैयार करने के पीछे कारीगरों की कड़ी मेहनत और लंबे समय की प्रक्रिया होती है। गमछे को तैयार करने में धागे से लेकर बुनाई और डिजाइन तक कई चरणों से गुजरना पड़ता है। महिला कारीगर अपनी मेहनत और हुनर से पारंपरिक वस्त्रों को आकर्षक रूप प्रदान करती हैं।उन्होंने बताया कि इस पहल का उद्देश्य पारंपरिक हस्तकरघा उद्योग से जुड़ी महिलाओं को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराकर उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना भी है। क्लस्टर में महिलाएं समूह के रूप में काम करते हुए अपनी पारंपरिक कला को आगे बढ़ा रही हैं। डिजाइन आर्टिस्ट दर्शना बोरे ने बताया कि किसी भी वस्त्र को तैयार करने से पहले उसके डिजाइन की रूपरेखा तैयार की जाती है। इसके बाद समूह की महिलाएं उस डिजाइन को अपने हुनर और मेहनत के जरिए कपड़े पर आकार देती हैं। इस पूरी प्रक्रिया में डिजाइन, बुनाई और कारीगरी का समन्वय होता है।मानस नेशनल पार्क पारंपरिक पोशाक क्लस्टर हस्तकरघा कला को संरक्षित करने के साथ-साथ स्थानीय महिला कारीगरों को रोजगार और आत्मनिर्भरता से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल कर रहा है।







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