वर्षों से विकास को तरस रहा छितौनी गांव, बारिश में बन जाता है टापू

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दुर्गेश गिडवानी

लोहता (वाराणसी)। प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के काशी विद्यापीठ ब्लॉक अंतर्गत ग्राम सभा छितौनी की ब्राह्मण बस्ती आज भी मूलभूत सुविधाओं के अभाव से जूझ रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि बस्ती का मुख्य मार्ग पिछले 19 वर्षों से उपेक्षित पड़ा है। कभी यहां बना ईंट का खड़ंजा पूरी तरह गायब हो चुका है और अब रास्ता कीचड़ व जलभराव का पर्याय बन गया है।
ग्रामीणों के अनुसार बरसात शुरू होते ही पूरा मार्ग तालाब में तब्दील हो जाता है। घुटनों तक भरे पानी और दलदल जैसी स्थिति के कारण स्कूली बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों को आवागमन में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। आए दिन लोग फिसलकर चोटिल हो जाते हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि हर वर्ष बारिश से पहले ग्राम प्रधान और ग्राम सभा के जिम्मेदारों से सड़क निर्माण की मांग की जाती है, लेकिन उनकी शिकायतों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती। ग्रामीणों ने विकास कार्यों में पक्षपात का आरोप लगाते हुए कहा कि कुछ क्षेत्रों में कार्य कराए जाते हैं, जबकि इस बस्ती की लगातार अनदेखी की जा रही है।
इस संबंध में काशी विद्यापीठ ब्लॉक के खंड विकास अधिकारी (बीडीओ) राजेश यादव ने बताया कि ग्रामीण विकास के लिए मिलने वाला बजट सीधे ग्राम प्रधान को उपलब्ध कराया जाता है और क्षेत्रीय विकास कार्यों की प्राथमिकता तय करना प्रधान की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि सभी क्षेत्रों को ध्यान में रखते हुए योजनाबद्ध ढंग से कार्य कराया जाना चाहिए।
बीडीओ के बयान के बाद ग्रामीणों ने सड़क निर्माण के लिए आवंटित धनराशि और विकास कार्यों के लेखा-जोखा की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका सवाल है कि यदि विकास कार्यों के लिए बजट उपलब्ध था, तो पिछले 19 वर्षों में इस मुख्य मार्ग का निर्माण या मरम्मत क्यों नहीं कराई गई।
ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि बारिश से पहले सड़क या खड़ंजा निर्माण का कार्य शुरू नहीं कराया गया, तो वे आंदोलन करने को मजबूर होंगे।
शिकायत करने वालों में अजय मिश्रा, संतोष मिश्रा, प्रमोद मिश्रा, विवेक मिश्रा, संजय सिंह, विनोद सिंह, प्रमोद सिंह, शेषधर मिश्रा, मुरारी यादव, लालजी यादव और संतोष यादव सहित कई ग्रामीण शामिल हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि विकास के दावों के बीच छितौनी की यह तस्वीर प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के लिए गंभीर चुनौती है। अब देखना यह होगा कि जिम्मेदार अधिकारी इस समस्या का समाधान कब तक सुनिश्चित कर पाते हैं।

Sahara Jeevan
Author: Sahara Jeevan

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