महोबा।
बुंदेलखंड के अमर क्रांतिकारी पंडित परमानंद की 136वीं जयंती पर महोबा स्थित परमानंद चौक पर श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गई। इस अवसर पर बड़ी संख्या में बुंदेली समाज के लोगों ने उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण कर स्वतंत्रता संग्राम में दिए गए उनके योगदान को स्मरण किया।
कार्यक्रम का नेतृत्व कर रहे बुंदेली समाज के संयोजक तारा पाटकर बुंदेलखंडी ने प्रशासन से स्मारक की उपेक्षा पर कड़ा ऐतराज जताया। उन्होंने बताया कि अंडमान की कालापानी जेल में 22 वर्ष तक कठोर सजा भुगतने वाले इस महान सेनानी के स्मारक की रेलिंग जगह-जगह से टूटी हुई है और नियमित सफाई न होने के कारण यहां गंदगी फैली रहती है।
पं. परमानंद का जन्म 1889 में हमीरपुर जनपद की राठ तहसील के सिकरौधा गांव में हुआ था। वे एक विद्वान, विचारक और निर्भीक सेनानी थे। उनकी विद्वता से प्रभावित होकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने उन्हें ‘पंडित’ की उपाधि दी थी।
कायस्थ समाज के अध्यक्ष अरविंद खरे और सेवानिवृत्त शिक्षक शिव कुमार त्रिपाठी ने बताया कि स्वतंत्रता के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें केंद्र सरकार में मंत्री बनने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन परमानंद जी ने यह कहते हुए प्रस्ताव ठुकरा दिया कि उन्होंने आज़ादी की लड़ाई किसी पद के लिए नहीं लड़ी थी।
दुर्भाग्यवश, स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पंडित परमानंद ने अपना जीवन झांसी क्षेत्र में गुमनामी में बिताया और 13 अप्रैल 1982 को उनका निधन हो गया। उनकी स्मृति में वर्ष 1989 में उनकी प्रतिमा स्थापित की गई और परमानंद चौक का निर्माण हुआ, लेकिन तब से लेकर आज तक स्मारक की हालत लगातार बदतर होती गई है।
भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के जिलाध्यक्ष दिलीप जैन ने भी स्मारक की दुर्दशा पर नाराज़गी जताई और कहा कि मूर्ति का वर्षों से रंग-रोगन नहीं हुआ, जो उनकी कुर्बानी का अपमान है।
इस मौके पर डा. अजय बरसैंया, मनीष जैदका, गयाप्रसाद कोस्टा, मनीष शंकर अमिष्ट, संतोष सक्सेना, विष्णु खरे, अवधेश गुप्ता, सुरेन्द्र, वीरेन्द्र श्रीवास्तव, राम शरण सक्सेना, रमाकांत मिश्र, गोविंद विश्वकर्मा और प्रेम चौरसिया समेत कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
बुंदेलखंड के इस महान सपूत को याद करते हुए, समाज ने एक बार फिर सरकार और प्रशासन से आग्रह किया कि पंडित परमानंद के स्मारक की मरम्मत कर उसे सम्मानजनक स्वरूप दिया जाए।
Author: Harshit Shrivastav
Sahara jeevan newspaper





