“दो जून की रोटी” — यह सिर्फ शब्द नहीं, एक सपना है। एक ऐसा सपना जिसे हर आम इंसान हर दिन देखता है और पाने के लिए मेहनत करता है।
“दो जून” कोई तारीख नहीं है। यह सुबह-शाम का वह वक्त है जब एक परिवार की थाली में रोटी होना तय करता है कि दिन कैसा बीता। कभी रोटी संघर्ष का प्रतीक बनती है, कभी सम्मान का, और कभी अस्तित्व का सवाल।
रोटी का मतलब सिर्फ भोजन नहीं, एक जीवन दर्शन है।
नवजात को माँ का पहला दूध मिले या शहीद के मुख में तुलसीदल रखा जाए — हर अवस्था में भोजन का संबंध है। यही कारण है कि सिनेमा से लेकर साहित्य तक, हर जगह “रोटी” की कहानी कही गई है।
1979 में बनी फिल्म “दो जून की रोटी” ने बताया कि यह सिर्फ भूख नहीं, बल्कि इंसान की इज़्ज़त और हक़ की लड़ाई है।
मुंशी प्रेमचंद के पात्र — होरी, हल्कू, या ‘कफन’ के घीसू— सब इसी रोटी के लिए जूझते हैं।
रोटी का स्वाद हर जगह बदलता है:
माँ के हाथ की रोटी, मेड की बनाई रोटी, पिता के संघर्ष की रोटी, नववधू की मुलायम रोटी, ससुराल में मिली रोटी या भिखारी की सूखी रोटी — हर एक रोटी अपने पीछे एक कहानी लिए होती है। और फिर है राजनीतिक रोटियां, जिन्हें सेंकने के लिए अलग किस्म की आग चाहिए।
🌾 *आज भी करोड़ों लोग “दो जून की रोटी” के लिए संघर्ष कर रहे हैं।*
Sahara Jeevan उन आवाज़ों को सामने लाने का काम करता रहेगा, जिनकी थाली अब भी खाली है। 🔴 #SaharaJeevan | सच की परछाईं में जनता की बात।
Author: Harshit Shrivastav
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