सुल्तानपुर-खैराबाद
मोहल्ले में स्थित इमाम बारगाह बेगम हुसैन अकबर में रविवार को किशवर जहां की याद में मजलिस का आयोजन किया गया। जिसे नौगावां सादात से आए मौलाना डॉ. सै. हसन अख्तर ने सम्बोधित किया। उन्होंने शादियों में दहेज की रीति को ग़लत ठहराया। मौलाना ने कहा कि पैगम्बर मोहम्मद ने अपनी बेटी फातेमा की शादी सादगी से की थी। शादी के तीन दिन बाद जब मोहम्मद साहब के दामाद हज़रत अली घरसे निकले तो एक आदमी ने उनसे कहा कहां उनके यहां शादी कर ली। हमारे यहां शादी करते तो अपने घर से तुम्हारे घर तक ऊंट पर दहेज की कतार लगा लेते। इस पर हजरत अली ने कहा जमीन से आसमान की तरफ निगाह करके देखो। उसने देखा तो ऊंटो की लाइन लगी थी जिस पर जवहारात लदे थे। हज़रत अली ने कहा हमें माले दुनिया की जरुरत नहीं है। वहीं मौलाना ने कहा कि बेटी का रिश्ता करते समय बाप बेटी पर रिश्ते को थोपे नहीं बल्कि रिश्ता आने पर बेटी की राय अवश्य ले। यही पैगम्बर मोहम्मद की सुन्नत है। मौलाना हसन अख्तर ने ये भी कहा कि हजरत अली के मानने वालों को हसद (किसी से जलना) नहीं करना चाहिए। इसलिए कि हसद कैंसर जैसा रोग है जो इंसान को घुटन देकर खत्म कर देता। उन्होंने ये भी कहा हज़रत अली अपने आगे की रोटी गरीब को दे देते। हम अगर आगे की रोटी नहीं दे सकते तो बची हुई ही गरीब को दे दें। यह इंसानियत की पहचान है। मजलिस का संचालन नज़र नकी ने किया। मजलिस में शफाअत हुसैन और आफताब हुसैन ने सोजखानी किया। वहीं अमन सुल्तानपुरी, चंदन फैजाबादी, ज़मीर सैदपुरी ने पेशखानी किया। मजलिस में हाजी हादी रजा, गमखार हुसैन, मोहम्मद नजीर, हसन अब्बास, एमएच खान, इकतेदार हुसैन आदि सैकड़ों लोग मौजूद रहे।
Author: Harshit Shrivastav
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