सहारा जीवन न्यूज़
कानपुर-ऋषि चैतन्य विजन द्वारा आयोजितगुरुवार को मोतीझील प्रांगण मे परम पूज्या आनंदमूर्ति गुरुमाँ

द्वारा अमृत वर्षा का 11 वर्ष बाद कानपुर में चार दिवसीय भक्ति, योग व ज्ञान की अमृत वर्षा का आयोजन ऋषि चैतन्य विजन समिति द्वारा किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि महापौर प्रमिला पाण्डेय ने पुष्प माला अर्पितकर परम पूज्य गुरुदेव आनन्दमूर्ति गुरुमाँ का अभिनंदन किया।गुरुदेव ने प्रसाद रूप से उन्हें श्रीमद्भगवद्गीता की प्रति आशीर्वाद स्वरूप दी।गुरुदेव ने सर्वप्रथम कानपुर में हो रहे विकास की भी सराहना की।शहर का बदलता परिवेश प्रशंसा के योग्य है। प्रणव के उच्चारण से प्रवचन श्रृंखला का आरंभ हुआ।गोविंद बोलो गोपाल बोलो के संकीर्तन से सभी श्रोताओं ने भक्ति रस के आनंद सागर में डुबकीलगाई। श्रीमद्भगवद्गीता के सूत्र को समझाते हुए गुरुदेव ने बताया किजैसे पतंगा तीव्र वेग से अग्नि में जल मरता है. वैसे ही मनुष्य वेगसे अपना नाश करते हैं. जब वे मृत्यु के मुख में प्रविष्ट हो जाते हैं।हर दिन हर छूटता श्वास मृत्यु की ओर ही गति है । अत्याधिक भोग से इंद्रियां और शरीर क्षीण हो जाते हैं। जीव भोग को नहीं भोग जीव को खा जाते हैं। सुख बाहर नहीं है. पूज्य गुरुदेव ने इसकी पूरी प्रक्रिया बताई।अज्ञानवश इंसान भोगों को सुख का केंद्र मानता है और ज्यादा भोग से रोगी होता है।मोबाईल, आईपैड,टेलिविज़नआदि से निकलने वाली ब्लू लाइट आंखों की रोशनी को कमज़ोरकरती है। अधिक नज़ारा देखने के भोग से देखने की शक्ति क्षीण होरही है। ऐसे ही ज्यादा ऊंची आवाज़ और हेडफोन लगाने वालों कीसुनने की शक्ति शीघ्र ही कम हो जाती है। ऐसे सब अपनी मृत्यु की ओर अग्रसर हो रहे हैं। जन्म और मृत्यु का यह चक्र मनुष्य के कर्मों का खाता ही निर्धारित करता है।सभी श्रोता जीवन में शुभ कर्म करने की और प्रेरित हों इसलिए गुरुदेव ने समझाया कि हमारेऋषियों ने स्वर्ग और नर्क की बात शास्त्रों में की हैं ताकि हर कर्म को करने से पहले विचार करे | नर्क के भय से ही सही मनुष्य अपराध व दुष्कर्म करने से बचेगा । समाज में शांति और सौहार्द्र बनेगा। पाप पुण्य का विचार ही शुभकर्मों के लिए प्रेरित करता है। केवल भोग भोगकर अगर आप अपना जीवन जी रहे हैं तो तेजी से मृत्यु की ओर बढ़ रहे हैं। यह शिक्षा प्रारंभिक स्तर पर ही मिलनी चाहिए । शुभ और अशुभ का विचार आवश्यक है।शास्त्र चिंतन, वेद वेदांत का चिंतन नहीं है. इसलिए जीवन में सही और गलत का चयन मनुष्य नहीं कर पाता। कोई हमारा बुरा कर सकता है यह भी व्यर्थ का विचार है । सर्व में परमात्म दर्शन करने की क्षमता एक ज्ञानी, तत्त्वज्ञानी में ही होती है। हर पल कुछ बुरा न होजाए ऐसी चिंता भय को पैदा करती है। बुराई तुम्हारे चित्त में है तो बाहर सब बुरा होगा। एकदम मस्त हो कर जिया करो ।सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः सर्वे भद्राणि पश्यन्तुमा कश्चित् दुःखभाग् भवेत् । सब का शुभ हो. ऐसी कामना हृदयमें लाओ। अपने मूल संस्कारों को मत भूलो घर से निकलो तो यह श्लोक बोलकर शेर की तरहनिकल जाओ । डर उनको लगता है। जो ईश्वर को अपने से दूर मानते हैं। भक्त का चित्त सदा ईश्वर चरण अनुरागी होता है। भक्त की दृष्टि में सब ओर, सब जगह, सब में ईश्वर ही हैं। इसलिए वह निश्चिंत है। सर्व में परमात्मा हैं और परमात्मा हमारे हैं अगर यह समझ आ जाए तो आपके जीवन में सहज अनुशासन आ जाएगा। यही संस्कार बच्चों को यदि माता-पिता बचपन से ही देने लग जाएं, तो वह स्वयं ही सही रास्ते का चयन करेंगे और आपके हृदय में भी विश्रांति होगी। इसी संदर्भ में भगवद्गीता के अध्याय 15 के श्लोक 7 में का उदाहरण देते हुए गुरुमां ने बताया कि भगवान श्री कृष्ण स्वयं कहते हैं कि जीव मेराही अंश है। यह जानो कि सब संबंध अस्थायी हैं. सनातन तो केवल ईश्वर के साथ आपका संबंध है। रोज़ सुबह जब उठो तो सबसे पहली सुप्रभात स्वयं को कहो। उसके बाद सुप्रभात ईश्वर से कहो क्योंकि उसकी कृपा से तुम जिंदा हो। हम भगवान के बच्चे हैं तो जीवन में चिंता दुःख, शोक कैसा । ईश्वर समर्पण के बिना तनाव कम नहीं हो सकता। ईश्वर प्रेम और समर्पण की भावना सबके हृदय में दृढ़ हो सके. इसलिए पूज्य गुरुदेव ने मीरा बाई जी के भजन. मने चाकर राखो जी. के गायन से सभी श्रोताओं में ईश्वर प्रेम के अनंत रस को उजागर कर उनके हृदय में ही वृंदावन धाम का प्रकट कर दिया हिन्दी दैनिक सहारा जीवन न्यूज़ से ब्यूरो चीफ राजेश निगम की खास रिपोर्ट*





